हंसते हंसते आपको लोटपोट कर देगी #film #Lootcase
कोरोना के तनाव में हंसी का फव्वारा है फिल्म लूटकेस
#film #Lootcase
अमित शर्मा (फिल्म समीक्षा)
इस फिल्म समीक्षा का एक्सप्लेनर वीडियो आप भारत के जाने माने वॉइस ओवर आर्टिस्ट वर्सेटाइल वी के चैनल पर भी सुन सकते हैं। वीडियो देख सकते हैं। लिकं है-
लीजिए अब समीक्षा पढ़िए।
नमस्कार जी.. हम सब जिंदगी में ये हसरत रखते हैं कि काश एक लौटरी लग जाए,.. और हम करोड़पति हो जाएं.. अरबपति हो जाएं.. खरबपति हो जाएं. हम
कई कई बार अखबार में या मीडिया में जब पढ़ते हैं कि फलां जगह ठिकाना के 12 करोड़ की लौटरी लगी है, तो ये सुन कर मुंह से निकलता है.. कि अरे भगवान.. या अल्लाह, हे वाहे गुरु.. ओह जीजस... हमारे क्यों नही.. इतनी अच्छी किस्मत हमें क्यों नहीं दी।
वीनू पंजाबी- अबे तेरे को कैसे पता.. मैं तो हर बार यही सोचता हूं जब कभी पता चलता है कि किसी की लौटरी लगी और वो रातों रात अमीर हो गया।
मुझे पता था. तुम तो जरूर ही सोचते होगे। खैर ऐसा सत्तर फीसदी लोग सोचते हैं.. पर वो क्या कभी ये सोचते हैं कि लौटरी लगने के लिए किस्मत से पहले भी कोई एक चीज की जरूरत होती है
वीनू पंजाबी- क्या
लौटरी के टिकट को खरीदने की।
वीनू पंजाबी- ओ तेरी
अरे काके... यही तो बताना चाह रहा हूं। हम ईश्वर को.. अपनी किस्मत को.. सबको कोस लेते हैं.. पर ये नहीं सोचते कि लौटरी लगने के लिए लौटरी का टिकट भी तो खरीदना होता है।
वीनू पंजाबी- बहुत अच्छे.. मेरे यार.. मुझे पहली बार तेरी कोई बात पसंद आई है. वरना बाकि टाइम तो तू यूं ही चिकनी चुपड़ी बातें करता रहता है। पर ये बता आज ये ज्ञान क्यों.. क्या तेरी लौटरी लगी क्या।
अबे नहीं बे.. मैं भी उन्हीं सत्तर फीसदी लोगों में से हूं। कोसता हूं पर सोचता नहीं कि टिकट ही नहीं खरीदा। अब आपके उस सवाल का जवाब कि आज ये रातों रात खरबपति बनने की बात क्यों। उसका कारण है आज की हमारी फिल्म लूटकेस। जिसका हम एक्स्प्लेनर करने जा रहे हैं।
वीनू पंजाबी- ओ.. तो ये सब भूमिका थी.. प्लाटिंग थी... बड़े हरामी हो बेटा.... (यहां वीजुअल में मिर्जापुर का मीम लगा सकते हो.. गूगल पर बड़े हरामी हो बेटा लिखना.. इमेज आ जाएगी)
चलो तो बात करते हैं 2020 में कोरोना पैनेडैमिक में ओटीटी पर रिलीज हुई हल्की फुल्की फिल्म लूटकेस की। कोई स्टार कास्ट नहीं. कोई तामझाम नहीं। एक सामान्य सी कहानी पर कॉमेडी की भरमार वाली ये फिल्म आपको गुदगुदाएगी। कहानी भी कोई तोप नहीं.. करेक्टर कमााल के पर जगह जगह फीके भी पड़ते हैं, फिर भी ये फिल्म आपको मोबाइल या डिवाइस बाजू में रखने को नहीं कहेगी। आप इसे पूरी देखना ही पसंद करेंगे। IMdb पर इस फिल्म को रेटिंग मिली है 7.6.... हम्मम नोट बैड. हॉटस्टार के प्लेटफार्म पर ये 31 जुलाई 2020 को रिलीज हुई थी।
सबसे पहले बात कर लेते हैं कहानी की. फिल्म की कहानी बहुत सिंपल है. इसमें कोई सस्पेंस या बड़ा ड्रामा नहीं है जिसके लिए आपको दिमाग लगाना पड़े. हालांकि, कहानी को प्रेजेंट करने का तरीका पुराना होते हुए भी कुछ टाइमिंग्स के कारण थोड़ा ठीक दिखता है. कहानी ये है कि एक न्यूज पेपर मशीनघर में काम करने वाले नंदन यानी कुणाल खेमू को रात में घर लौटते वक्त एक सूटकेस मिलता है. सूटकेस पैसों से भरा हुआ है. वो किसी तरह उसे लेकर घर पहुंचते हैं और अपनी आम जिंदगी को खास बनाने में जुट जाते हैं. इधर जिसके पैसे हैं, जिसका बैग है वो गुंडे सूटकेस को ढूंढने में लगे हैं। वो नंदन के पीछे भी लग जाते हैं. नेता, पुलिस, गुंडे सब मिलाकर पूरी खिचड़ी और हंसी का तड़का. फिल्म की कहानी इतनी सी है. सूटकेस से नंदन का प्यार और आम आदमी की कहानी ही फिल्म की कहानी की अहम कड़ी है.
फिल्म में एक्टिंग की बात करें तो सबने अपना-अपना काम किया है. हल्की कॉमेडी के साथ कुणाल खेमू नॉर्मल ही दिखे हैं. कहानी उनके आसपास घूमती है पर कोई चौंकाने वाली एक्टिंग नहीं है. उनकी जोड़ी रसिका दुग्गल के साथ है. रसिका की एक्टिंग ठीकठाक है, वे सिर्फ एक हाउसवाइफ के किरदार में हैं. जिस तरह पिछले दिनों रसिका वैब सीरीज की धांसू खूंखार बहू बन कर उभरी हैं। ऐसे में उनसे आपको अगर बहुत ज्यादा उम्मीदे हैं तो आपको फिल्म में निराश होंगे। हम ये भी नहीं कह रहे कि रसिका की एक्टिंग खराब है। पर जब आप कुछ अच्छा कर लेते हैं तो फिर आपसे उम्मीदें बहुत बढ़ जाती हैं। रसिका का मामला भी अब यही रहेगा। ऐसे ही फिल्म में विजय राज, रणवीर शौरी जैसे दिग्गज करेक्टर रोल प्ले करने वाले एक्टर हैं। पर यहां भी रसिका वाला फार्मूला। अच्छा किया है पर उम्मीद इनसे ऐसी होती है कि बस छा जाएं। जरूरी नहीं कि बड़ा अहम रोल लिखा हो।
वीनू पंजाबीः अमा तुम कहना क्या चाहते हो। बहुत इम्पोर्टेंट रोल लिखा जाएगा तभी तो एक्टर अपनी प्रतिभा दिखाएगा।
नहीं वीनू.. ये कमर्शियल सिनेमा में होता है। मथर्ड एक्टिंग तो बिना डायलॉग के भी हिट बना देती है। उदाहरण देता हूं। विजय राज को ख्याति मिली अभिषेक बच्चन वाली फिल्म रन से। उन्हें आज भी लोग कौआ बिरयानी कह कर पुकारते हैं। उस फिल्म में उनका स्ट्रांग किरदार लिखा गया था। ओके। ऐसी ही उनकी फिल्म थी, मानसून वैडिंग। उसमें उनका किरदार बहुत कोई खास था नहीं, उन्होंने अपनी मैथर्ड एक्टिंग से उसे खास बनाया। कमाल का रोल किया। और अब बात करता हूं धमाल फिल्म की। गजब की कॉमेडी फिल्म। एक से बढ़ कर एक सितारे। सबने खूब हंसाया। ऐसे में फिल्म के एंड में विजय राज की तीन से पांच मिनट की एंट्री रही होगी, बस... और वो कमाल कर गए। आज भी एयरपोर्ट पर जाने वाला बंदा जब एटीसी टावर की ओर देखता है तो धमाल को फ्लाइंग सीन याद आ जाता है और याद आते हैं विजय राज.
खैर... लौटते हैं लूटकेस पर....
फिल्म में एक्टिंग का बड़ा बोझ गजराज राव, विजयराज और रणवीर शौरी के कंधों पर है. और वे इसे ठीक-ठीक निभाते हैं. खासकर गजराज राव की एक्टिंग फिल्म दर फिल्म खिलती जा रही है. यहां उनका रोल एक भ्रष्ट नेता का है और वे इसे बहुत ही संजीदगी से निभाते हैं. उनके कुछ सीन में कॉमेडी का सिंपल इनपुट प्रभाव छोड़ता है. डायरेक्शन पर बात करूं उससे पहले कुनाल खेमू पर भी बात करते हैं। कुनाल को हम बचपन से देखते आ रहे हैं। हम हैं राही प्यार के, राजा हिन्दुस्तानी स्वीट बच्चा गोलमाल, ढोल, गो गोआ गोन से होते हुए अब पटौदी खानदान का दामाद है। कलयुग जैसी फिल्म में वो सिंगल स्टार भी रहें है। पर कुनाल सुपर स्टार नहीं बन पाए। सही मायने में उनकी छवि लीड हीरो की सी नहीं बन पाई। इस फिल्म में वो लीड में हैं, पर फिर भी लगेगा कि हां वो एक्टर हैं.. लीड हीरो नहीं।
फिल्म के डायरेक्शन की बात करें तो शुरुआत काफी अच्छी होती है. खासकर नंदन कुमार को जिस वक्त सूटकेस मिलता है. यहां कुछ सीन में कैमरे का भी कमाल दिखाया गया है. हालांकि, शुरू होने के बाद कहानी को स्थापित करने के लिए डायरेक्टर राजेश कृष्णनन सीन दर सीन इसे यहां वहां रखते हैं जो कि थोड़ा उबाऊ होता है. बाकी डायरेक्शन भी ठीक ही कहा जा सकता है. स्टोरीलाइन ही कोई ऐसी बड़ी नहीं है कि आप कुछ ज्यादा मेहनत कर पाएं. इस टॉपिक पर बॉलीवुड में कई फिल्में बन चुकी हैं.
फिल्म ठीकठाक है और आपके भी 2 घंटे 11 मिनट हंसी-मजाक के साथ बीत जाएंगे. फिल्म में कोई बहुत क्लाइमैक्स नहीं है जिसके लिए आपको टेंशन लेनी हो, यानी आप घर में फैमिली के साथ चाय नाश्ता करते, खाना बनाते हुए भी देख सकते हैं, कुछ मिस नहीं होगा. वीकेंड में रिलीज हुई तो लोगों के पास घरों में वक्त भी होगा.
कुल मिलाकर लब्बोलुआब की बात करें तो...
'लूटकेस'. फिल्म के राइटर और डायरेक्टर हैं राजेश कृष्णन, फिल्म की अच्छी स्क्रिप्ट और साफ-सुथरी कॉमेडी इसे प्रॉमिसिंग बनाती है. फिल्म में लीड किरदार में नजर आते हैं कुणाल खेमू जो कि एक 'आम आदमी' बने हैं और अखबार प्रिंटिंग प्रेस में टेक्निशियन के तौर पर काम करते हैं. एक भ्रष्ट राजनेता के तौर पर नजर आए गजराव राव जब भी स्क्रिन पर आते हैं छा जाते हैं. वहीं रसिका दुग्गल जो कुणाल खेमू की पत्नी बनी हैं, उन्हें हम ज्यादातर गंभीर किरदारों में ही देखते नजर आए हैं, लेकिन इस फिल्म में वो बिल्कुल परफेक्ट फिट बैठती हैं. फिल्म में विजय राज एक माफिया के तौर पर नजर आए हैं, जिन्हें नेशनल जियोग्राफिक चैनल बेहद पसंद होता है, ऐसे में वो हर डायलॉग में जानवरों के साइंटिफिक नाम लेते हुए अपने गुर्गों को समझाया करते हैं.
फिल्म में रणवीर शौरी एक पुलिसवाले की भूमिका में हैं जो नेताओं के लिए काम किया करते हैं. फिल्म में एक चीज को बड़ी खूबसूरती से दिखाया गया है कि आखिर इतना पैसा जब एक मध्यम वर्गीय शख्स के पास आ जाए तो वो उसे खर्च कैसे और कहां करे, इस उधेड़बुन में भी कुणाल खेमू के किरदार नजर आते हैं.
फिल्म की शुरुआत में और एंड में कुनाल खेमू का एक डायलॉग गजब है कि जब उनके हाथ में सूटकेस आता है तो वो छद्म ईमानदारी जिसे हम स्यूडो ऑनेस्टी कहते हैं, दिखाते हैं। वो हल्की आवाज में आसपास कहते हैं कि भाई ये सूटकेस किसी का है क्या.. या मैं ले जाऊं... वो ये दिखाता है कि भाई भगवान के सामने बंदे ने अपनी ईमानदारी निभाई। अब ये पैसा वो ले जा सकता है।
नेताओं और पुलिस की सांठगांठ, अंडरवर्ल्ड के राइवल डॉन्स का भी एक दूसरे रंजिश के बाद भी एक हो जाना, मिडल क्लास के छोटे छोटे सपने,
अभी के लिए करते हैं खुदाहफिज.. राम राम.. आपको किसी मूवी का, वैबसीरीज का अगर एक्स्प्लेनर चाहिए तो लिखिए.. बंदा हाजिर है। खम्मा घणी।
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